Sardar Vallabhbhai Patel Biography in Hindi | सरदार वल्लभभाई का पटेल जीवन परिचय

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Sardar Vallabhbhai Patel Biography in Hindi स्वागत है दोस्तों हमारे इस नये लेख में। दोस्तों आज हम उस महापुरुष की बात करेंगे जिन्होंने पुरे भारत को एक किया था। अगर वेह नहीं होते तो हैदराबाद, जम्मू-काश्मीर और राजस्थान यह सभी इलाखे भारत में नहीं होते। उन्ही के वजह से आज भारत इतना ताकतवर और क्षेत्रफल के मामले में इतना बड़ा हो चूका है। आज हम उस इंसान की बात करेंगे जिसके सम्मान में दुनिया का सबसे बड़ा पुतला Statue Of Unity का निर्माण कराया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल जिन्हे पूरा भारत Iron Man Of India के नाम से जाने जाते है। दोस्तों आज हम सरदार वल्लभभाई जीवनी के विषय में बात करेंगे । जानने के लिए हमारे साथ पोस्ट में अंत तक बने रहिये।

जन्म 31 अक्टूबर 1875
जन्म स्थाननाडियाड
नाम सरदार वल्लभभाई पटेल
पिताझावर भाई
मातालाड़ बाई
पत्नीझावेर बा
भाई सोमभाई पटेल, नरसिंहभाई पटेल, विट्ठलभाई पटेल
बहनदहिबा
बेटाड़ाहयाभाई
बेटीमणिबेन
आयु (age)75 वर्ष
जाति (caste)कुर्मी जाति
मूर्ती कहाँ हैगुजरात
राजनैतिक पार्टीइंडियन नेशनल कांग्रेस
मृत्यु15 दिसम्बर 1950
मृत्यु स्थानबॉम्बे

Sardar Vallabhbhai Patel का जन्म ३१ अक्टूबर १८७५ को गुजरात के नडियाद में हुआ। इनका पूरा नाम वल्लभभाई झावेरभाई पटेल लेकिन सरदार पटेल के नाम से काफी लोकप्रिय थे। इनके पिता किसान और स्वतंत्र्यसेनानी थे। आर्थिक स्थिति शुरू में इतनी कमजोर थी की, सरदार पटेल दोस्तों से किताबे माँगकर पढ़ा करते थे।  १०वी कक्षा उन्होंने N.K  High School Petlad, Gujarat में अपनी पढाई पूरी करी। बाद में उन्होंने Law की पढाई की, उसमे उन्होंने द्वितीय रैंक लेकर आये। सरदार पटेल ऐसे लॉयर जो की Undefeatable  उनको कोई हरा नहीं सकता था। शुरुआत में वह गांधीजी को पसंद नहीं करते थे। जब गांधीजी गुजरात क्लब आते थे, तब वह बोलते थे की,ऐसे संडास साफ़ करके ब्रम्हचारी का व्रत लेके हमे आजादी नहीं मिलने वाली। लेकिन २ साल बाद जब चम्पारण्य का सत्याग्रह हुआ तब वह गांधीजी से बहुत प्रभावित हुये। 

गांधीजी से सरदार पटेल कब मिले थे?

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गांधीजी से उनकी मुलाकात सत्याग्रह के २ साल बाद हुयी थी। जब वह Bombay Presidency Political Conference में आये थे अहमदाबाद के अंदर १९१७ में। और वहा पे फिर एक बार वह गांधीजी से बहुत प्रभावित हुए थे जब उन्होंने Resolution Of Loyalty To The British King के लेटर को फाड़ दिया था। इसके बाद सरदार पटेल में विदेशी कपड़ों को त्याग दिया और स्वदेशी कपड़ों को अपना लिया। और मातृभाषा को ज्यादा बढ़ावा देने लगे। इसके बाद कही सालो तक गांधीजी को सहयोग किया। 

वल्लभभाई पटेल सरदार कैसे बने?

१९२८ में उनको एक मौका मिला जब वह लीडर बनके जनता के सामने आये। गुजरात में कुछ किसान थे उनके फसल खराब हो गये थे। और जो अंग्रेज थे उन्होंने ६ से २२ प्रतिशत तक लगान बढ़ा दिया। और उन किसानो को वार्निंग दी थी अगर लगान नहीं दिया तो जमीन हड़प लेंगे। वह किसान अपनी परेशानी लेकर गांधीजी के पास आये लेकिन उस समय वह अपने दुसरे कार्य में मग्न थे तब उन्होंने सरदार पटेल को मदत के लिए भेजा। तब तक वह सरदार नहीं बने थे। 

वल्लभभाई पटेल किसानो के पास गये उन से थोड़ी बातचीत की। उन्होंने २-३ आदमी को यह पता लगाने के लिए बोले की अंग्रेज आज किस किसान की जमीन हड़प ने वाले है। और इनको नियम पता था लॉयर होने के कारण या तो अंग्रेज अंगूठा लगायेंगे या फिर सिग्नेचर करवाएँगे तब जमीन उनके के नाम होगी। जैसे ही उनको पता चलता की अंग्रेज आज इस किसान का जमीन हड़प ने वाले है, वह उस किसान को गायब कर देते थे और २-३ महीनो के बाद उस  किसान को वापस उसके घर छोड़ देते थे। सारे के सारे किसानों को एक एक करके गायब करते गये और २-३ महीनों के बाद वापस छोड़ देते थे। ऐसे ही कुछ दिनों तक चलता रहा उसके बाद अंग्रेज परेशान हो गये, ना उनको लगान मिल रहा था और ना उनको जमीन मिल रही थी फिर अंग्रेजो ने किसानों से माफ़ी मांगी और लगान फिर से २२ से ६ प्रतिशत पर ले आये। उन किसानो की औरते बहुत खुश हुयी और उन्होंने उनका नाम वल्लभभाई पटेल से सरदार वल्लभभाई पटेल रख दिया। तब से वह सरदार के नाम से लोकप्रिय होने लगे। 

सरदार वल्लभभाई पटेल पहले प्रधानमंत्री क्यूँ नहीं बने?

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सन १९४६ में जब दूसरा विश्वयुद्ध हुआ था,तब अंग्रेज काफी कमजोर हो गये थे। इसके बाद उन्होंने निर्णय लिया की अब भारत को उनका शासन लौटा देते है। इसके बाद एक इंटरनल वर्किंग कांग्रेस कमिटी बनायीं गयी। इस कमिटी में यह निर्णय लिया था की, इस बार जो १९४६ का अध्यक्ष चुना जायेगा वो भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा। नया अध्यक्ष चुनने के लिए गांधीजी ने वोटिंग करवाया। इसके बाद सारे प्रांतीय कमिटी को वर्किंग कमिटी में से किसी एक को अध्यक्ष पद के लिए चुनना था। गांधीजी, नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य क्रिपलानी, राजेंद्र प्रसाद, खान अब्दुल गफार यह सब वर्किंग कमिटी के मेंबर्स थे। फिर जब सारे प्रांतीय कमिटी ने वोट किया तब १२ वोट सरदार पटेल को, २ वोट आचार्य क्रिपलानी को मिले थे। जवाहरलाल नेहरू को एक भी वोट नहीं मिला था। इस बात से नेहरू बहुत निराश हो गये थे। 

गांधीजी ने जब नेहरू को ऐसे दुःखी देखा तब उन्होंने थोड़ा विचारविवश के बाद एक चिट्टी निकाली और उसमे कुछ लिखा और सरदार पटेल को दे दिया। उन्होंने वह चिट्टी  खोली और उसमे जो लिखा वह पढ़कर उस चिट्टी को अपने जेब में रख दिया। और वही उन्होंने बोला की “में अपनी दावेदारी अध्यक्ष पद से वापस लेता हु” सभी लोग हैरान हो कर सरदार पटेल को देखने लगे। सब समझ गये की गांधीजी ने मना कर दिया कागज में लिख कर। जैसे ही गांधीजी ने कागज में लिखा वह पढ़कर सरदार पटेल ने बिना कोई सवाल किये अपने दावेदारी वापस ले ली थी। इसके बाद सरदार पटेल के जगह नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। कुछ दिनों बाद जब कुछ पत्रकारों ने इस विषय पर गांधीजी को सवाल पूछा तब उन्होंने बताया की, अगर हमने नेहरू को प्रधानमंत्री नहीं बनाया होता तो वह कांग्रेस तोड़कर चला गया होता और इस बात का अंग्रेज फायदा उठा लेते। इसलिए गांधीजी ने सरदार पटेल को पीछे किया था। 

सरदार पटेल को ‘ आयरन मॅन ऑफ़ इंडिया ‘ क्यूँ कहते है?

Sardar Vallabhbhai Patel जब छोटे थे तब उनके हाथ पर बहुत बड़ा फोड़ा हो गया था। उस फोड़े में बस भर गयी थी इस वजह से उनको काफी ज्यादा दर्द हो रहा था। उनके माता पिता ने डॉक्टर को बुलवाया। डॉक्टर ने कहा की इस फोड़े में जलता हुआ गरम लोहा डालना पड़ेगा। डॉक्टर भी घबरा रहा था और साथ ही साथ उनके माता पिता भी घबराये हुए खड़े थे। डॉक्टर बोले मुझसे नहीं हो पायेगा लेकिन सरदार पटेल ने वह गरम लोहा उठाया और उस गरम लोहे से फोड़े को फोड़ दिया। 

सरदार पटेल का भारत-पाकिस्तान विभाजन में योगदान

जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हो रहा था तब ब्रिटिश सरकार के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन चाहते थे की भारत और पाकिस्तान के तरफ से एक एक आदमी आगे आयेगा, दोनों साथ में मिलकर बातचीत करेंगे। पाकिस्तान के तरफ से मोहम्मद अली जिन्नाह आगे आये और भारत के तरफ से नेहरूजी ने सरदार पटेल को आगे कर दिया। जब बँटवारा शुरू हुआ तब जिन्नाह ने हर चीज़ में ५०% मांग की थी लेकिन सरदार पटेल ने सिर्फ २०% दिया था। भारत क्षेत्रफल के मामले में बहुत बड़ा है और पाकिस्तान क्षेत्रफल और जनसँख्या के मामले में काफी छोटा है इसलिये सरदार पटेल ने पाकिस्तान को २०% हिस्सा दिया था। पैसा,सोना,चाँदी,पोस्टेज स्टैम्प,,पोस्टल, रेवेन्यू स्टैम्प इन सभी चीज़ो में से ८०% भारत को मिलना था और २०% पाकिस्तान को। जब हर चीज़ का बँटवारा हो रहा था तब सरदार पटेल ने भारत के ऊपर जो कर्ज़ा था उसको भी पाकिस्तान के साथ बाँट लिया। उस समय भारत के पास ४०० करोड़ रुपये थे,तब जिन्नाह २०० करोड़ रुपये की माँग कर रहे थे लेकिन पाकिस्तान की जनसँख्या और खर्च भारत के मुकाबले काफी कम थी इसलिए सरदार पटेल ने सिर्फ ७५ करोड़ रुपये ही दिये थे। Sardar Vallabhbhai Patel ने जिन्नाह को २० करोड़ रुपये ही दिये और बाकी के ५५ करोड़ रुपये बाद में देने का फैसला किया। इसके बाद जिन्नाह करेंसी (Currency) प्रिंटिंग मशीन की माँग की लेकिन सरदार पटेल ने उसको भी नकार दिया। सरदार पटेल ने कहा की, जब तक तुम्हारी करेंसी प्रिंटिंग मशीन नहीं बन जाती तब तक तुम यहाँ से नोट ले जाना। इसके बाद जिन्नाह ने intelligence bureau की माँग की लेकिन सरदार पटेल ने इसको भी साफ़ साफ़ मना कर दिया। लॉर्ड माउंटबेटन जो उस समय के वायसराय थे उनके पास एक सोने की गाड़ी थी और चाँदी की गाड़ी थी। लॉर्ड माउंटबेटन वह गाड़ी भेट स्वरुप देना चाहते थे। तब जिन्नाह ने सोने की गाड़ी की माँग की थी, तब सरदार पटेल ने टॉस करने का निर्णय लिया। टॉस भारत के पक्ष में गिरा और सोने की गाड़ी भारत को मिल गयी और चाँदी की गाड़ी पाकिस्तान को मिल गयी। बटवारे के बाद जब जिन्नाह आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा था इसलिए सरदार पटेल ने बाकी के ५५ करोड़ देने से इनकार कर दिया। लेकिन जब गांधीजी अंटशंट पे बैठ गए थे इसलिए बाकि के ५५ करोड़ पाकिस्तान को देना पड़ा। 

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कोलकत्ता में जब हिन्दू-मुस्लिम विवाद हो रहे थे, जब लड़ाईया बढ़ती जा रही थी तब ७ सितम्बर १९४७ को सरदार पटेल ने दंगाइयों को दिखते ही गोली मारने का आदेश दिया था। हजरत निज़ामुद्दीन में जब मुसलमानों को दिक्खत आयी तब सरदार पटेल वहा जाकर परिस्थितियों को संभाला था। जब लाहौर से अमृतसर ट्रैन आती थी उस समय ट्रैन में हजारों की संख्या में हिन्दुओं की लाश पड़ी होती थी। इसके बाद हिन्दुओ ने मुसलमानो को मार के ट्रैन में भेजा करते थे। तब सरदार पटेल अमृतसर जाकर सारे सिखों को समझाया की हम मुसलमानो को नहीं मारेंगे। 

भारत में ५६५ रियासते थी। Sardar Vallabhbhai Patel ने ५६१ रियासते तो हासिल कर ली थी लेकिन बाकी ४ रियासते पाकिस्तान में जाना चाहती थी। जोधपुर के राजा हनुमंत सिंह और उसके साथ धौलपुर के राजा थे दोनों जाकर जिन्नाह से मिले और बातचीत की, जिन्नाह ने उनको कराची का बंदरगाह साथ में अनाज और हथियार और सारी सुख सुविधाएं देने का वादा किया। राजा हनुमंत सिंह ने पाकिस्तान में जाने का फैसला किया। जोधपुर के पीछे पीछे राजस्थान की जो २१ रियासते थी वह भी पाकिस्तान में जा रही थी। लेकिन सरदार पटेल ने राजा हनुमंत सिंह के साथ बातचीत करके उनको भारत में शामिल कर दिया। इसके बाद गुजरात का जुनागढ़ जो पाकिस्तान के साथ जा रहा था। जूनागढ़ में राजा तो मुस्लिम था लेकिन वहा की सारी प्रजा हिन्दू थी इसलिए सरदार पटेल ने सारे हिन्दू को राजा के खिलाफ भड़खाया। वहा के सारे जहाँगीरदारो ने पाकिस्तान में मिलने से इनकार कर दिया। इस तरह जूनागढ़ भी भारत में शामिल हो गया। इसके बाद हैदराबाद में काफी ज्यादा दिक्खते आ रही थी। उस समय तेलंगाना, आँध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ यह सभी इलाखे हैदराबाद में आते थे। वहा का जो नवाब था कासिम रिजवी बहुत ही अमीर और शक्तिशाली था। वह हैदराबाद को एक अलग देश बनाना चाहता था। सरदार पटेल युद्ध करना नहीं चाहते थे। इसके बाद कासीम रिजवी ने पकिस्तान को २० करोड़ रुपये दिए ताकि वह हथियार खरीद कर कश्मीर में आतंकी हमला कर सके। सरदार पटेल हैदरबाद के निजाम को आखिरी खत लिख कर भेजा लेकिन वह अपनी बातों पर अड़ा रहा। इसके बाद पटेल ने सैन्य कार्यवाही का आदेश दिया और हैदराबाद की फ़ौज ने ५ दिनों में ही अपने घुटने टेक दिये। इसके बाद हैदराबाद भारत में शामिल हो गया जो की भारत की बहुत बड़ी जीत थी।  

दोस्तों कैसे लगी आपको Sardar Vallabhbhai Patel Biography in Hindi अगर आपको सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन परिचय पसंद आया है, तो इसे शेयर जरूर जरिये। और आपको और किस महँ इंसान के बारे मे जीवन परिचय जानना है उस इंसान का नाम कमेंट करके जरूर बताइये।

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